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Friday, May 22, 2020

उत्तराखंड के रसीले व स्वादिष्ट काफल

अपने कुमाऊँ प्रवास के दौरान मैंने प्रसिद्ध कुमाऊँनी गीत ''बेडु पाको  बारो मासा नरण काफल पाको चैता मेरी छैला..." सुना. इस गीत को थोड़ी मशक्कत के बाद कोई भी हिंदी भाषी  भी समझ सकता है . बेडु एक फल होता है जो वर्ष के 12 महीने पकता है जबकि काफल सिर्फ चैत्र के महीने में पकता है.

काफल दिखने में शहतूत जैसा किंतु आकार में गोल होता है एवं बहुत से औषधीय गुणों से परिपूर्ण होता है इसका वानस्पतिक नाम Myrica esculenta और फैमिली Myricaceae  है .इसे बॉक्सी मिरटल (boxy myrtle) या बे -बेरी(bay berry) भी कहते हैं.
               

                   
काफल मुख्यतः भारत के उत्तराखंड व भूटान एवं नेपाल की पहाड़ियों  कर पाया जाता है.
वृक्ष(tree) अथवा झाड़ी(shrubs) की ऊंचाई लगभग 6-8 मीटर होती हैं और फल मई -जून के महीने में पककर तैयार होते हैं . फल  स्वाद में खट्टे -मीठे होते हैं जोकि विटामिन और आयरन के अच्छे स्रोत होते हैं.

 मई -जून के महीने में काफल कुछ स्थानीय लोगों की आजीविका का भी साधन होता है. इन महीनों में बस स्टॉप व अन्य  सार्वजनिक स्थानों पर स्थानीय  लोग काफल बेचते रहते हैं.

  काफल का लंबे समय तक भंडारण नहीं किया जा सकता है यह पेंड़ से टूटने के बाद एक ही दिन में खराब होने लगता है इसलिए इसका ट्रांसपोर्ट पहाड़ों से दूर दराज के इलाकों में नहीं किया जा सकता . इस वृक्ष की खेती नहीं होती है यह प्राकृतिक रूप से उगता है इसलिए इसके संरक्षण की नितांत आवश्यकता है .बहुत सी कुमाऊनी लोक कथाओं में भी काफल का जिक्र किया गया है.
                         

काफल के बहुत सारे स्वास्थ्य संबंधी फायदे हैं . यह एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत होता है .जुकाम, अरक्तता (anaemia),अस्थमा ,अतिसार व  यकृत संबंधी बीमारियो में काफल काफी लाभकारी होता है.

 फल के साथ - साथ काफल की छाल व पत्तियां भी  बहुत सारे  औषधीय  गुण  रखते हैं . छाल में एंटी इन्फ्लेमेटरी ,एंटीबायोटिक और  एंटीआकसीडेंट  गुणधर्म होते है.
काफल में एंटी - एजिंग और कैंसर - रोधी क्षमता भी होती है.

काफल से संबंधित कोई रोचक अनुभव या महत्वपूर्ण जानकारी हो तो साझा करें.
( पहला फोटो गढ़वाल से हमारे मित्र Navendu Raturi और दूसरा पिथौरागढ़ से हमारी छोटी बहन रेनू धामी के सौजन्य से साभार )